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सांभल विवाद: सपा नेता माता प्रसाद पांडे का प्रशासन पर गंभीर आरोप, बिना नोटिस रोका दौरा

भारत न्यूज़ लाइव

सांभल विवाद: समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) माता प्रसाद पांडे ने शनिवार को आरोप लगाया कि उन्हें सांभल जाने से रोकने के लिए प्रशासन ने केवल मौखिक सूचना दी। उन्होंने कहा कि नियमों के अनुसार लिखित नोटिस दिया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

“सरकार अपनी विफलताओं को छिपा रही है”

माता प्रसाद पांडे ने कहा, “न्याय आयोग, मीडिया और अन्य लोग सांभल जा सकते हैं, तो हमें वहां जाने से क्यों रोका गया? सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए ऐसा कर रही है।” उन्होंने बताया कि जिलाधिकारी (डीएम) ने उन्हें 10 दिसंबर तक सांभल नहीं जाने का आग्रह किया।

पार्टी कार्यालय में होगा आगे का फैसला

पांडे ने कहा, “हमने पहले ही कार्यक्रम तय कर लिया था। डीएम और सचिव संजय प्रसाद ने मुझे फोन कर बताया कि स्थिति बदल सकती है। हम पार्टी कार्यालय जाकर आगे की रणनीति तय करेंगे।”

डिप्टी सीएम पर पलटवार

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पांडे ने कहा, “हम किसी को भड़काते नहीं हैं। यह भाषा डिप्टी सीएम मौर्य जी इस्तेमाल करते हैं। अगर मीडिया वहां जा सकती है, तो हम जाने पर हिंसा कैसे होगी?”

सांभल दौरे का उद्देश्य

सपा के 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सांभल के घटनास्थल का दौरा करने की योजना बनाई थी। पांडे ने कहा कि वे वहां पुलिस की “क्रूरता” का निरीक्षण करेंगे और उन परिवारों से मिलेंगे जिन्होंने इस घटना में अपने प्रियजनों को खो दिया।

पुलिस पर गंभीर आरोप

पांडे ने पुलिस पर निशाना साधते हुए कहा, “क्या पुलिस कभी अपनी गलती मानती है? आजकल पुलिस के पास सरकारी और गैर-कानूनी दोनों तरह के हथियार होते हैं। वे गैर-कानूनी हथियारों से फायरिंग करते हैं।”

राम गोपाल यादव का प्रशासन पर हमला

सपा सांसद राम गोपाल यादव ने भी सांभल की पत्थरबाजी की घटना पर प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया और आरोप लगाया कि प्रशासन ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ा।

विधानसभा में उठेगा मुद्दा

सांभल हिंसा को लेकर विपक्षी दल योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमलावर हैं। बताया जा रहा है कि वे इस मुद्दे को विधानसभा सत्र में जोर-शोर से उठाएंगे।

विवाद की जड़: सर्वे और कानूनी प्रक्रिया

यह पूरा विवाद एक कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ, जहां एक याचिका में दावा किया गया था कि जिस मस्जिद को लेकर विवाद हुआ, वह मूलतः एक मंदिर थी।

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