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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने माता-पिता की संपत्ति का सम्मान न करने और उनकी सेवा न करने वाले बच्चों के खिलाफ एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अगर माता-पिता द्वारा संपत्ति उपहार (गिफ्ट डीड) में दी गई हो और संतान उनकी देखभाल न करे, तो वह संपत्ति वापस ली जा सकती है।
मामले का सारांश:
- मध्य प्रदेश के छतरपुर का मामला:
- उर्मिला दीक्षित नामक महिला ने अपनी संपत्ति 2019 में अपने बेटे सुनील शरण दीक्षित को एक गिफ्ट डीड के माध्यम से ट्रांसफर की थी।
- बेटे ने संपत्ति मिलने के बाद माता-पिता की देखभाल करने का वचन दिया था।
- लेकिन बाद में उसने न केवल अपने वचन का पालन नहीं किया, बल्कि और अधिक संपत्ति पाने के लिए माता-पिता पर हमला भी किया।
- एसडीएम का आदेश:
- 2020 में उर्मिला दीक्षित ने एसडीएम से गिफ्ट डीड रद्द करने की मांग की।
- एसडीएम ने मामले की जांच के बाद गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया।
- हाईकोर्ट का हस्तक्षेप:
- बेटे ने एसडीएम के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की।
- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एसडीएम के फैसले को पलट दिया, यह कहते हुए कि गिफ्ट डीड में माता-पिता की देखभाल का जिक्र नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
- सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि 2007 के ‘मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन्स एक्ट’ के तहत माता-पिता की संपत्ति पर संतान का अधिकार तभी वैध है जब वह उनकी देखभाल करे।
- गिफ्ट डीड में देखभाल का उल्लेख न होने पर भी:
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिफ्ट डीड में सेवा का उल्लेख न होना, संतान को उपेक्षा के आधार पर संपत्ति रखने का अधिकार नहीं देता।
- यह कानून बुजुर्गों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, और अदालतें इसे व्यापक दृष्टिकोण से लागू करेंगी।
2007 का कानून क्या कहता है?
- धारा 23:
- अगर माता-पिता या वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति यह शर्त रखते हुए देते हैं कि संतान उनकी देखभाल करेगी, लेकिन ऐसा नहीं होता, तो संपत्ति का हस्तांतरण अवैध माना जाएगा।
- ट्रिब्यूनल इस प्रकार की संपत्ति ट्रांसफर को रद्द करने का अधिकार रखता है।
महत्वपूर्ण संदेश:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बुजुर्गों की सेवा और देखभाल का अधिकार कानून द्वारा संरक्षित है। इस फैसले से यह संदेश गया है कि माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार प्राप्त करने के बाद उनकी उपेक्षा करने वाली संतानों को संरक्षण नहीं मिलेगा।
यह फैसला बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा और उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करने में एक मील का पत्थर साबित होगा।


