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कोलकाता l राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन , ट्रेड यूनियन को-आर्डिनेशन सेन्टर (टी.यू.सी.सी.) ने कहा कि केंद्रीय बजट से उम्मीद थी कि यह विकास की सतत गति को तेज़ी से आगे बढ़ाने वाला होगा। इसमें आयात और निर्यात के बीच अंतर को तर्कसंगत बनाकर छोटी, लघु एवं मध्यम (एमएसएमई) क्षेत्र के उद्यमों को बढ़ावा देने, रोजगार सृजन और ग्रामीण क्षेत्र में युवाओं की सतत आजीविका पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। मजबूत मध्यम वर्ग पर कर के बोझ को कम करने से जनता का ध्यान सरकार की ओर आकर्षित होगा।
पिछले वर्षों में सरकार ने नीतिगत पहल एवं विकास, खनन और वित्तीय क्षेत्र के साथ-साथ कार्बन आधारित उद्योग में सुधारों के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा दिया है। खिलौना और चमड़ा उद्योग को समर्थन देने से एमएसएमई उत्पादन के दायरे में वृद्धि हुई है और साथ ही भारतीय घरेलू बाजार में इन उत्पादों की चीनी डंपिंग को रोकने में सफलता मिली है। कार्बन आधारित नीतिगत सुधार इन उत्पादों के वैश्विक निर्यात का मार्ग प्रशस्त करेंगे। दाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए चिन्हित 100 जिलों में विशेष योजनाएँ चलाई जाएंगी। साथ ही, कृषि उत्पादों की उच्च उपज को सुनिश्चित करने के लिए अनाज गोदामों को सुदृढ़ किया जाएगा, जिससे कृषि उत्पादों के अधिकतम उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। कराधान सुधारों के परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में वृद्धि होगी, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। अन्य रियायतें करदाताओं के उत्पीड़न और मानसिक पीड़ा को कम करेंगी, जिससे आर्थिक सुगमता बढ़ेगी।
उन्होंने कहा कि सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक वर्ग की अपेक्षाओं पर यह बजट खरा नहीं उतरा। आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के वेतन में वृद्धि, निर्माण, घरेलू और आंगनवाड़ी क्षेत्रों को ईएसआई कवरेज, अनौपचारिक श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के लिए वित्तीय सहायता, और मछुआरों के लिए निर्वाह भत्ता जैसी आवश्यक योजनाओं के लिए बजट आवंटन बढ़ाने की अपेक्षाएँ थीं। लेकिन वित्त मंत्री ने गिग श्रमिकों के ई-श्रम पोर्टल में पंजीकरण की उनकी आवश्यकताओं की अनदेखी की।
78 लाख ईपीएस पेंशनभोगियों को एक जीवंत पेंशन की आवश्यकता है, जिसे टीयूसीसी (ट्रेड यूनियन कोऑर्डिनेशन सेंटर) ने बजट-पूर्व चर्चाओं में उठाया था। लेकिन इस ज्वलंत मुद्दे को बजट में शामिल नहीं किया गया। टीयूसीसी का मानना है कि समाज में दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने वालों के लिए भी नीति सुधारों के माध्यम से सुखी जीवन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय बजट में असंगठित श्रमिकों को कब संगठित माना जाएगा, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है। सरकार की आर्थिक नीतियाँ विकास की ओर बढ़ रही हैं, लेकिन असंगठित श्रमिकों की उपेक्षा चिंता का विषय बनी हुई है।
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