महाकुंभ के रजनीकांत: राजा हर्षवर्धन जो अपनी संपत्ति भी दान कर देते थे!

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कुंभ और दान का अटूट रिश्ता
प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ 2025 में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगा रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं, इस धार्मिक मेले की जड़ें किससे जुड़ी हैं? इतिहास में दर्ज है कि भारत के अंतिम महान सम्राट हर्षवर्धन ने न सिर्फ कुंभ मेले की परंपरा शुरू की, बल्कि हर पांच साल में अपनी पूरी संपत्ति दान कर देते थे।
दानवीर राजा: ‘सब कुछ दान, बस खाली हाथ वापस!’
इतिहासकार बताते हैं कि राजा हर्षवर्धन हर साल अपनी संपत्ति चार भागों में बांटकर दान करते थे—शाही परिवार, सेना, धार्मिक निधि, और गरीबों के लिए। दान का सिलसिला तब तक चलता था, जब तक उनके पास राजसी वस्त्र तक न बचते।
हर्षवर्धन और कुंभ की शुरुआत
कहा जाता है कि हर्षवर्धन (590-647 ई.) ने कुंभ मेले को औपचारिक रूप दिया। वे भगवान सूर्य, शिव, और बुध की उपासना के बाद दान-पुण्य करते थे। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी उनकी दरियादिली का जिक्र करते हुए लिखा कि हर्षवर्धन की सभाओं में हजारों भिक्षु और साधु हिस्सा लेते थे।
अमृत बूंदों से जुड़ा है कुंभ का इतिहास
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरीं, वहां कुंभ का आयोजन होता है। इतिहासकारों के मुताबिक, कुंभ मेले का लिखित वर्णन लगभग 2000 साल पुराना है।
राजा हर्षवर्धन: महानता की मिसाल
हर्षवर्धन को उत्तर भारत के एकीकरण का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने कन्नौज को राजधानी बनाकर पूरे उत्तर भारत को एक सूत्र में पिरोया।
क्या आज भी हैं ऐसे दानवीर?
महाकुंभ में दान-पुण्य का महत्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है। राजा हर्षवर्धन की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि निस्वार्थता और परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं।



