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उत्तराखंड l हिमालय क्षेत्र, विशेष रूप से उत्तराखंड, में बड़े भूकंप की संभावना को लेकर देश के प्रमुख भूवैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में टेक्टोनिक प्लेटों के बीच घर्षण के चलते ऊर्जा एकत्र हो रही है। छोटे-छोटे भूकंपों की बढ़ती आवृत्ति इसका संकेत हैं। भूगर्भीय गतिविधियों की इन्हीं संभावनाओं को लेकर हाल ही में देहरादून में दो बड़े सम्मेलन आयोजित किए गए—वाडिया इंस्टीट्यूट में “Understanding Himalayan Earthquakes” और एफआरआई में “Earthquake Risk Assessment”, जिसमें देशभर से आए विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
ऊर्जा का संचय और भविष्य की चेतावनी
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में हर साल भारत और यूरेशिया की टेक्टोनिक प्लेटें टकराती हैं, जिससे बहुत अधिक भूगर्भीय ऊर्जा जमा होती जा रही है। यह ऊर्जा तब बाहर निकलती है जब चट्टानों में दबाव के चलते दरारें आती हैं और प्लेटें खिसकती हैं। वर्तमान में इस प्रक्रिया की गति धीमी है, जिससे एक बड़ी मात्रा में ऊर्जा एकत्र हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगला बड़ा भूकंप 7.0 या उससे अधिक तीव्रता का हो सकता है।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के अनुसार, उत्तराखंड में भूगर्भीय प्लेटों की गति “लॉक्ड” हो चुकी है। इससे यह क्षेत्र और अधिक संवेदनशील बन गया है। “प्लेटें हर साल लगभग दो सेंटीमीटर खिसकती हैं, लेकिन उत्तराखंड में यह गति धीमी है, जिससे टेक्टोनिक तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है,” उन्होंने कहा।
पिछले भूकंप और वर्तमान गतिविधियाँ
उत्तरकाशी में 1991 में आए 7.0 तीव्रता के भूकंप और चमोली में 1999 में आए 6.8 तीव्रता के भूकंप के बाद से अब तक इस क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। इस अंतराल के चलते भी वैज्ञानिकों को आशंका है कि अब काफी ऊर्जा एकत्र हो चुकी है, जो किसी समय भी बड़े भूकंप का कारण बन सकती है।
नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले छह महीनों में उत्तराखंड में 1.8 से 3.6 तीव्रता तक के 22 छोटे भूकंप दर्ज किए गए हैं। इनमें से अधिकांश झटके चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और बागेश्वर जिलों में महसूस किए गए।
बड़े भूकंप से पहले छोटे झटकों की चेतावनी
शोध में यह भी पाया गया है कि बड़े भूकंप से पहले अक्सर छोटे भूकंपों की आवृत्ति बढ़ जाती है। फिलहाल जो धीमे भूकंप आ रहे हैं, वे इतने अधिक नहीं हैं कि यह कहा जा सके कि सारी ऊर्जा निकल गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भूकंप की तीव्रता में मामूली बढ़ोतरी से भी ऊर्जा की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है। उदाहरण के तौर पर, 4.0 तीव्रता का भूकंप जितनी ऊर्जा छोड़ता है, 5.0 तीवता का भूकंप उससे लगभग 32 गुना अधिक ऊर्जा छोड़ता है।
भूकंप पूर्वानुमान की चुनौती
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. इम्तियाज परवेज (सीएसआईआर, बेंगलूरू) का कहना है कि भूकंप का सटीक पूर्वानुमान आज भी बहुत मुश्किल है। “कब, कहां और कितनी तीव्रता का भूकंप आएगा, यह बता पाना वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है। हालांकि, भूकंप संभावित क्षेत्रों की पहचान और ऊर्जा संचय के क्षेत्रों की निगरानी जरूर की जा सकती है।” इसी उद्देश्य से उत्तराखंड में दो जीपीएस स्टेशन लगाए गए हैं और भविष्य में इनकी संख्या बढ़ाई जाएगी।
मैदान बनाम पहाड़: कहां होगा ज्यादा नुकसान?
वाडिया संस्थान में हुई कार्यशाला में यह निष्कर्ष निकाला गया कि अगर समान तीव्रता के भूकंप पहाड़ और मैदान दोनों क्षेत्रों में आते हैं, तो मैदानी क्षेत्रों में अधिक नुकसान की आशंका रहती है। इसका मुख्य कारण यह है कि बड़े भूकंप सामान्यतः सतह से 10 किलोमीटर की गहराई में आते हैं। यह गहराई कम होने की वजह से इनके प्रभाव अधिक होते हैं। 2015 में नेपाल में आया भूकंप गहरी सतह से उत्पन्न हुआ था, इसलिए उसकी तीव्रता अधिक होने के बावजूद अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ।
देहरादून की भूगर्भीय मजबूती का होगा परीक्षण
भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील होने के कारण केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के कुछ शहरों को विशेष अध्ययन के लिए चुना है। इसमें देहरादून भी शामिल है। सीएसआईआर बेंगलूरू द्वारा इस अध्ययन में शहर की विभिन्न भौगोलिक परतों की मजबूती, चट्टानों की संरचना और मोटाई की जांच की जाएगी। पहले भी वाडिया इंस्टीट्यूट और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने सिस्मिक माइक्रोजोनेशन किया था, लेकिन अब यह विस्तृत अध्ययन होगा।
चेतावनी प्रणाली और भूदेव एप
भूकंप से जनहानि को कम करने के लिए उत्तराखंड सरकार और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर अलर्ट सिस्टम विकसित कर रहे हैं। राज्य के पर्वतीय इलाकों में 169 स्थानों पर विशेष सेंसर लगाए गए हैं। ये सेंसर 5.0 या उससे अधिक तीव्रता के भूकंप की स्थिति में 15 से 30 सेकंड पहले चेतावनी दे सकते हैं। यह जानकारी लोगों को “भूदेव” नामक मोबाइल एप के माध्यम से मिलेगी, जिससे वे सुरक्षित स्थान पर पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं।
उत्तराखंड और पूरा हिमालयी क्षेत्र एक अत्यधिक संवेदनशील भूकंप क्षेत्र है। वैज्ञानिकों की चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जहाँ एक ओर पूर्वानुमान की सीमाएं हैं, वहीं जागरूकता, तैयारियों और सतत निगरानी के माध्यम से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जनता, प्रशासन और वैज्ञानिक समुदाय को मिलकर सतर्कता और जागरूकता बनाए रखनी होगी, ताकि किसी भी आपदा की स्थिति में जान-माल की हानि न्यूनतम रहे।
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