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उत्तराखंड में छात्रसंघ चुनावों के निरस्त होने पर छात्रों का प्रदर्शन मसूरी कॉलेज में उच्च शिक्षा मंत्री का पुतला जलाया

एडिटर , भारत न्यूज़ लाइव

मसूरी l उत्तराखंड में राजकीय विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों के निरस्त होने के बाद छात्रों में भारी आक्रोश देखने को मिला है। शनिवार को मसूरी के एमपीजी कॉलेज के छात्रों ने कॉलेज के गेट पर प्रदर्शन करते हुए प्रदेश सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और उच्च शिक्षा मंत्री के पुतले को आग के हवाले कर दिया। छात्रों ने अपनी आवाज उठाते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने उनके लोकतांत्रिक हक को कुचला है।

प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि अगर विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र नेताओं का अस्तित्व नहीं रहेगा, तो शिक्षक और प्रबंधन छात्रों से जुड़े मुद्दों की अनदेखी करेंगे। छात्रों ने चेतावनी दी है कि यदि 4 नवंबर तक छात्रसंघ चुनावों की मांग नहीं मानी गई, तो वे अनिश्चितकाल के लिए कॉलेज में तालाबंदी कर देंगे और पढ़ाई नहीं होने देंगे।

छात्रों ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि नौकरशाही का वर्चस्व बढ़ गया है। उन्होंने महाविद्यालयों के निजीकरण की साजिश रचने और छात्रसंघ को समाप्त कर छात्रों की आवाज को दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। छात्रों ने यह भी कहा कि पिछले दो वर्षों में छात्रसंघ चुनाव लिंगदोह समिति की सिफारिशों के विपरीत नवंबर-दिसंबर में संपन्न हुए थे, जो कि एक बड़ी चिंता का विषय है।

इसके अलावा, छात्रों ने यह भी कहा कि भाजपा को आगामी उपचुनावों और निकाय चुनावों में हार का डर सता रहा है, जिसके चलते सरकार छात्रसंघ चुनावों को आयोजित करने से बच रही है। यह सभी मुद्दे मिलकर छात्रों के आक्रोश का कारण बन रहे हैं और उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे।

छात्रसंघ चुनावों की बहाली के लिए उनका यह संघर्ष न केवल मसूरी के छात्रों का बल्कि पूरे उत्तराखंड के छात्रों का एकजुटता का प्रतीक है। उनका मानना है कि छात्रसंघ चुनाव से ही उनकी आवाज सुनी जाएगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सशक्त किया जाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा क्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है। क्या छात्रसंघ चुनावों की बहाली से वास्तव में छात्रों के मुद्दों को सुलझाया जा सकेगा, या यह केवल एक राजनीतिक खेल है? यह सवाल अब सभी के सामने है। छात्रों का यह आंदोलन आने वाले दिनों में शिक्षा नीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, और देखने वाली बात होगी कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है।

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