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उत्तराखंड l समान नागरिक संहिता (यूसीसी) कानून लागू किए जाने के बाद अब राज्य सरकार जनजातीय समुदायों को भी इससे जोड़ने की दिशा में कदम ब ढ़ा रही है। फिलहाल, राज्य की अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को यूसीसी से स्वैच्छिक रूप से जुड़ने की आज़ादी देने की तैयारी की जा रही है। इसका मतलब है कि कोई भी जनजातीय परिवार चाहे तो यूसीसी के प्रावधानों के अंतर्गत आ सकता है, लेकिन यह उन पर अनिवार्य नहीं होगा।
राज्य सरकार का यह कदम सामाजिक समानता और संवैधानिक एकरूपता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। अधिकारी बताते हैं कि सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि जनजातीय समाज अपनी परंपराओं और रीतियों को बनाए रखते हुए आधुनिक कानून व्यवस्था का लाभ उठा सके।
अगर एसटी समुदाय यूसीसी से जुड़ता है तो उन्हें कई कानूनी और सामाजिक फायदे मिल सकते हैं। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामलों में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्राप्त होंगे। पारिवारिक विवादों के समाधान में एक समान कानून लागू होने से न्याय प्रक्रिया सरल और तेज़ हो जाएगी। पारंपरिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ समुदाय को आधुनिक न्याय प्रणाली और कानूनी सुरक्षा का लाभ भी मिलेगा। महिलाओं को संपत्ति, तलाक और भरण-पोषण से संबंधित मामलों में बराबरी का दर्जा मिलेगा। समान कानून से राज्य के सभी वर्गों के बीच एकता और समानता की भावना भी मजबूत होगी।
हालांकि, जनजातीय समुदाय में कुछ चिंताएँ और आशंकाएँ भी हैं। उनका मानना है कि यूसीसी से उनकी संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर असर पड़ सकता है। जनजातीय समाज की अपनी विशिष्ट विवाह पद्धतियाँ और पारिवारिक परंपराएँ हैं, जिन्हें वे अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं। कुछ समुदायों को यह भी डर है कि यूसीसी लागू होने से धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। पहाड़ी इलाकों में लोगों को अभी तक यूसीसी के नियमों और प्रावधानों की पूरी जानकारी नहीं है, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इसके अलावा, कुछ लोगों को आशंका है कि इस विषय पर मतभेद समाज में विभाजन भी पैदा कर सकते हैं।
राज्य सरकार इस विषय पर विस्तृत परामर्श प्रक्रिया चला रही है। प्रशासन द्वारा जनजातीय इलाकों में जनजागरण अभियान शुरू किया जा रहा है ताकि लोगों को यूसीसी के प्रावधानों और उनके अधिकारों की पूरी जानकारी दी जा सके। अधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय पूरी तरह स्वैच्छिक होगा और किसी पर इसे थोपने का प्रयास नहीं किया जाएगा।
उत्तराखंड की जनजातियाँ यूसीसी से जुड़ेंगी या नहीं, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा, लेकिन यह कदम राज्य के सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। जहां एक ओर यह समानता और न्याय की दिशा में सुधार साबित हो सकता है, वहीं दूसरी ओर परंपरागत सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण को लेकर चिंता भी बनी हुई है। सरकार का उद्देश्य दोनों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना है ताकि विकास और परंपरा दोनों साथ चल सकें।
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