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ग्राम पिपोला में दिव्य श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन उमड़ा आस्था का सैलाब, गौपाल मणि जी महाराज ने दिए श्रेष्ठ कर्म और संस्कारों के प्रेरक संदेश ।

विक्रम सिंह कठैत ( एडिटर) ,भारत न्यूज़ लाइव

नई टिहरी । बड़कोट क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पिपोला (नंदगांव) में श्रीमती सरोजिनी चमोली एवं पुरुषोत्तम चमोली के आवास पर आयोजित नौ दिवसीय दिव्य श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा स्थल पर सुबह से ही क्षेत्र के विभिन्न गांवों से श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया। महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों सहित बड़ी संख्या में भक्तों ने व्यासपीठ से प्रवाहित हो रही श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर धर्म, अध्यात्म और मानव जीवन के गूढ़ रहस्यों को आत्मसात किया। पूरा वातावरण भगवान श्रीकृष्ण के जयघोष, भजन-कीर्तन और वैदिक मंत्रोच्चार से भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण के साथ-साथ भक्ति रस में डूबकर अपने जीवन को आध्यात्मिक दिशा देने का संकल्प भी लिया।

कथा के मुख्य व्यास, विख्यात गौ-संत परम पूज्य श्री गौपाल मणि जी महाराज ने अपने प्रेरणादायी प्रवचनों में मानव जीवन के महत्व को अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में समझाते हुए कहा कि मनुष्य जन्म ईश्वर की सर्वोत्तम और दुर्लभ देन है। यह केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं के उपभोग के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण, परोपकार, सेवा, भक्ति और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला दिव्य ज्ञान है। जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ कथा का श्रवण करता है, उसके भीतर आत्मचिंतन की भावना जागृत होती है और उसे यह बोध होता है कि इस मृत्यु लोक में उसका वास्तविक उद्देश्य क्या है।

पूज्य महाराज ने कहा कि आत्मा अपने सर्वोच्च स्वरूप में मनुष्य शरीर में ही रहती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन में सदैव सत्य, धर्म, सेवा, दया, करुणा और सदाचार का पालन करे। उन्होंने कहा कि अच्छे कर्म ही मनुष्य की वास्तविक पूंजी हैं। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा यहीं रह जाते हैं, लेकिन व्यक्ति के कर्म उसके साथ चलते हैं और वही उसके जीवन तथा मृत्यु के बाद की यात्रा का आधार बनते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म का चयन सोच-समझकर करना चाहिए।

अपने प्रवचन में उन्होंने जन्म और मृत्यु के शाश्वत सत्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जन्म और मृत्यु प्रकृति के अटल नियम हैं। जो इस संसार में जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद प्रत्येक जीव को अपने किए हुए कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को कभी भी अधर्म, छल, कपट, हिंसा, अहंकार और लोभ के मार्ग पर नहीं चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मों का लेखा-जोखा ईश्वर के न्यायालय में अत्यंत सूक्ष्मता से होता है, जहां किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होता। इसीलिए जीवन को सार्थक बनाने के लिए सदैव धर्म और सत्य का अनुसरण करना चाहिए।

परम पूज्य श्री गौपाल मणि जी महाराज ने व्यासपीठ से उपस्थित श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को श्रेष्ठ कर्मों के माध्यम से देव जीवन में परिवर्तित करने का प्रयास करे। उन्होंने कहा कि ईश्वर की भक्ति तभी पूर्ण मानी जाती है जब उसके साथ सेवा, सदाचार और मानवता का भाव भी जुड़ा हो। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य अपने व्यवहार में विनम्रता, प्रेम और करुणा को स्थान देता है, तो उसका जीवन स्वयं ही ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है।

उन्होंने विशेष रूप से माता-पिता को संबोधित करते हुए कहा कि आज के समय में बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और श्रेष्ठ संस्कारों से भी जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संस्कारवान पीढ़ी ही समाज और राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य बनाती है। यदि बच्चे बचपन से ही सत्य, सेवा, अनुशासन, बड़ों के सम्मान और धर्म के प्रति आस्था सीखेंगे, तो वे भविष्य में आदर्श नागरिक बनेंगे। उन्होंने कहा कि परिवार ही बच्चों की पहली पाठशाला होता है और माता-पिता उनके प्रथम गुरु होते हैं।

महाराज ने अपने प्रवचन में भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण तथा अन्य अवतारों का उल्लेख करते हुए कहा कि समय-समय पर भगवान स्वयं मनुष्य रूप में अवतरित होकर मानव समाज को धर्म, सत्य, कर्तव्य और आदर्श जीवन का मार्ग दिखाते रहे हैं। भगवान के जीवन से प्रेरणा लेकर प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का सार यही है कि मनुष्य अपने भीतर छिपे दिव्य गुणों को जागृत करे और समाज में प्रेम, सद्भाव, भाईचारा तथा सेवा की भावना को मजबूत बनाए।

कथा के दौरान श्रद्धालु पूरे समय भक्ति रस में डूबे रहे। व्यासपीठ से प्रवाहित हो रही कथा के प्रत्येक प्रसंग को श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा और एकाग्रता के साथ सुना। कथा के बीच-बीच में भगवान के भजनों और संकीर्तन ने वातावरण को और अधिक भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीमद्भागवत की महिमा का गुणगान करते हुए आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की। पूरे परिसर में “राधे-राधे”, “जय श्रीकृष्ण” और “हरि बोल” के जयघोष लगातार गूंजते रहे।

आयोजकों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए कथा स्थल पर बैठने, पेयजल, प्रसाद वितरण तथा अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं भी सुव्यवस्थित ढंग से की गई थीं। कथा में स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जिससे आयोजन स्थल दिनभर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा।

तीसरे दिन की कथा में शांति प्रसाद भट्ट, जीतराम भट्ट, पंकज पवार, अनुसूया नौटियाल, विक्रम सिंह कठैत, सुरेन्द्र दत्त रतूड़ी, अमित रावत, भूषण पेटवाल, सतीष चमोली, शैलेन्द्र चमोली, अमित रतूड़ी, आदित्य नौटियाल, जिला पंचायत सदस्य टिपरी शकुंतला पंवार, बीना रावत, नीलम राधे, रूक्मिणी कठैत, नीलम नेगी, सोबन सिंह राणा, अरविंद नौटियाल, सरस्वती नौटियाल, सीमा चमोली, प्रियंका चमोली, ग्राम प्रधान सीमा नेगी, गुड्डी गुसाईं, डॉ. नित्यानंद उनियाल, राधाकृष्ण मैठाणी सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

आयोजन समिति ने बताया कि आगामी दिनों में भी श्रीमद्भागवत कथा के विभिन्न दिव्य प्रसंगों का रसपान कराया जाएगा, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। समिति ने क्षेत्रवासियों से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर कथा श्रवण करने तथा धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का आग्रह किया। कथा के समापन तक प्रतिदिन भजन-कीर्तन, प्रवचन एवं प्रसाद वितरण का कार्यक्रम जारी रहेगा। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसे धार्मिक आयोजन न केवल व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का माध्यम बनते हैं, बल्कि समाज में प्रेम, सद्भाव, नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करते हैं।

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