
विक्रम सिंह कठैत ( एडिटर) ,भारत न्यूज़ लाइव
देहरादून : उत्तराखंड का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य आज शोक में डूब गया है। राज्य आंदोलन के प्रखर योद्धाओं में शुमार और उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के वरिष्ठ नेता, पूर्व कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट का आज देहरादून स्थित उनके निवास पर निधन हो गया। वे 79 वर्ष के थे। उनके निधन की सूचना जैसे ही सामने आई, पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों और राज्य आंदोलनकारियों तक सभी ने दुख व्यक्त करते हुए दिवाकर भट्ट के योगदान को अविस्मरणीय बताया।
पिछले दस दिनों से दिवाकर भट्ट गंभीर रूप से अस्वस्थ थे और राजधानी देहरादून के इंद्रेश अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। डॉक्टरों के अनुसार उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। तमाम प्रयासों के बावजूद स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। सोमवार दोपहर डॉक्टरों ने परिवार को सूचित किया कि अब चिकित्सा द्वारा अधिक कुछ संभव नहीं है और उन्हें घर ले जाने की तैयारी करें। इसके बाद उन्हें चिकित्सकीय निगरानी से हटाकर घर ले जाया गया। जानकारी के अनुसार, घर पहुँचने के लगभग 10 मिनट बाद ही उन्होंने अंतिम सांस ली।
राज्य आंदोलन के आक्रामक नेता
दिवाकर भट्ट उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान सबसे अधिक सक्रिय और आक्रामक नेताओं में गिने जाते थे। 1990 के दशक में जब अलग राज्य की माँग तेज हुई, तब पहाड़ भर में उनके नेतृत्व में कई बड़े आंदोलन हुए। वे अपने बेबाक और संघर्षशील स्वभाव के लिए लोगों के बीच लोकप्रिय रहे। सड़कों पर आंदोलन हो या विधानसभा में सवाल—दिवाकर भट्ट ने हमेशा उत्तराखंड की पहचान, पहाड़ की अस्मिता और क्षेत्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष को प्राथमिकता दी।
उन्होंने उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की माँग को देशभर में मजबूती से उठाया। कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में वे समान रूप से स्वीकार्य चेहरे थे। जनता उनसे जुड़ाव महसूस करती थी क्योंकि वे साधारण लोगों की समस्याओं को सीधे मंचों पर और जन आंदोलनों में उठाते थे।
राजनीतिक जीवन और उपलब्धियाँ
दिवाकर भट्ट का राजनीतिक जीवन बहुत समृद्ध रहा। वे उत्तराखंड क्रांति दल के प्रमुख नेतृत्व में से एक थे। राज्य गठन के बाद वे दो बार विधायक बने और उन्हें कैबिनेट मंत्री का दायित्व भी मिला। अपने कार्यकाल में उन्होंने ग्रामीण विकास, युवा नीति, क्षेत्रीय योजनाओं और पहाड़ों में बुनियादी ढाँचे की मजबूती पर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
उनके समर्थकों का कहना है कि वे राजनीति में आने से पहले ही समाजसेवा में सक्रिय थे। राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने समानता, क्षेत्रीय संतुलन और रोजगार जैसे मुद्दों पर हमेशा मुखर रहकर आवाज उठाई।
अपनेपन से भरा नेता
दिवाकर भट्ट केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि पहाड़ी समाज की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तित्व थे। जनता से उनका रिश्ता केवल चुनावी नहीं था, बल्कि जीवन से जुड़ा हुआ था। वे पहाड़ की बोली-बानी, संस्कृति, लोकगीतों और परंपराओं से गहरा लगाव रखते थे। यही वजह थी कि बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, और गांवों से लेकर कस्बों तक, उनका एक बड़ा जनसमर्थन आधार था।
उनके साथ काम करने वाले लोग बताते हैं कि वे किसी भी कार्यक्रम में पहुँचकर सीधे लोगों से बातचीत करते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे और तत्काल समाधान के लिए अधिकारीयों से संपर्क करते थे। उनकी सरलता और पारदर्शिता उन्हें भीड़ से अलग करती थी।
राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर काम
दिवाकर भट्ट की खासियत यह थी कि वे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर प्रदेश के मुद्दों पर एकजुट होने की वकालत करते थे। कई मौकों पर उन्होंने विपक्ष और सत्ता पक्ष, दोनों के नेताओं को एक मंच पर लाकर पहाड़ की समस्याओं पर विमर्श कराया। वे मानते थे कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य को राजनीतिक संघर्ष से ज़्यादा विकासपरक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
निधन पर शोक की लहर
दिवाकर भट्ट के निधन की खबर फैलते ही राज्यभर में शोक की लहर दौड़ गई। विभिन्न राजनीतिक दलों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और नेताओं ने उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।
राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि दिवाकर भट्ट का निधन उत्तराखंड आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी का टूटना है। पीढ़ियों तक उन्हें एक संघर्षशील, सजग और निडर नेता के रूप में याद किया जाता रहेगा।
परिवार और अंतिम संस्कार
परिवार के अनुसार, दिवाकर भट्ट के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया उनके पैतृक स्थान पर की जाएगी। परिजन और निकट संबंधी उनके पार्थिव शरीर को दर्शन हेतु कुछ समय के लिए सार्वजनिक रूप से रखने पर विचार कर रहे हैं ताकि लोग अपने प्रिय नेता को अंतिम विदाई दे सकें।
स्मृतियों में सदैव जीवित रहेंगे
दिवाकर भट्ट का व्यक्तित्व विशाल, विचार स्पष्ट और संघर्ष अदम्य था। राज्य निर्माण की लड़ाई में उनका योगदान इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने उत्तराखंड की राजनीति को एक नई दिशा दी और पहाड़ के हक़-हकूक के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और समर्पण की गूँज आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
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