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अजमेर शरीफ विवाद: शिव मंदिर का दावा, सांप्रदायिक तनाव और देशभर में राजनीतिक तूफान

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अजमेर: अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह को लेकर राजस्थान की एक अदालत के नोटिस ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। विवाद की शुरुआत एक याचिका से हुई जिसमें दरगाह को “शिव मंदिर” घोषित करने और हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने की मांग की गई है। इस मुद्दे ने राजनीतिक और सांप्रदायिक हलचल को बढ़ा दिया है, कई नेताओं ने इसे देश के लिए खतरनाक बताया।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

सितंबर में अजमेर की एक स्थानीय अदालत में दायर याचिका में कहा गया कि अजमेर शरीफ दरगाह की जगह पर पहले एक शिव मंदिर था। याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से स्थल का सर्वे कराने और दरगाह का पंजीकरण रद्द करने की मांग की।
गुप्ता ने कहा, “हमारी मांग है कि अजमेर दरगाह को संकट मोचन महादेव मंदिर घोषित किया जाए और वहां हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया जाए।”

कानूनी संदर्भ और 1991 का पूजा स्थल अधिनियम

पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत, 15 अगस्त 1947 को धार्मिक स्थलों की स्थिति को बरकरार रखना अनिवार्य है। हालांकि, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद मामले में ASI सर्वेक्षण की अनुमति देकर इस कानून को चुनौती दी। अब इस फैसले को इस विवाद का आधार माना जा रहा है। अजमेर मामले में अगली सुनवाई 20 दिसंबर को होगी।

दरगाह का इतिहास और धार्मिक महत्व

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, फारस के प्रसिद्ध सूफी संत, ने अजमेर को अपनी साधना का केंद्र बनाया। उनके सम्मान में मुगल सम्राट हुमायूं ने दरगाह का निर्माण कराया। अकबर और शाहजहां ने भी दरगाह परिसर में मस्जिदें बनवाईं।

दरगाह के संरक्षकों का कहना है कि यह विवाद जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने के लिए खड़ा किया गया है। अंजुमन सैयद ज़ादगान के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने कहा, “यह दरगाह धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक है। हमें बाबरी मस्जिद का फैसला स्वीकार करना पड़ा, यह उम्मीद करते हुए कि आगे कोई विवाद नहीं होगा।”

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सांप्रदायिक तनाव

इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं विभाजित हैं। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सर्वेक्षण का समर्थन करते हुए इसे ऐतिहासिक सत्य बताया। वहीं, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और मेहबूबा मुफ्ती ने इस विवाद को देश की एकता और स्थिरता के लिए खतरा बताया।

ओवैसी ने कहा, “अजमेर दरगाह 800 साल से है। हर प्रधानमंत्री उर्स के दौरान चादर भेजते हैं। यह विवाद सिर्फ देश को अस्थिर करने के लिए खड़ा किया जा रहा है।”

पूर्व सीएम मेहबूबा मुफ्ती ने चेतावनी दी कि यह फैसले देश में सांप्रदायिक विभाजन को और गहरा करेंगे।

समाज में गहराता विवाद

अजमेर दरगाह हमेशा से विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के लिए आध्यात्मिकता का केंद्र रहा है। लेकिन इस विवाद ने इस पवित्र स्थल को सांप्रदायिक बहस का केंद्र बना दिया है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर इस तरह के विवाद जारी रहे, तो यह हिंसा और अस्थिरता को जन्म दे सकता है।

(नवीनतम सुनवाई और प्रतिक्रियाओं के लिए अपडेट का इंतजार करें।)

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