आँगनबाड़ी कर्मचारियों की आर्थिक बदहाली के खिलाफ मजदूर दिवस पर ज़िला मुख्यालयों पर प्रदर्शन

भारत न्यूज़ लाइव
उत्तर प्रदेश l आज 1 मई, ऐतिहासिक मजदूर दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश की आँगनबाड़ी कर्मचारी संगठनों ने “आँगनबाड़ी संयुक्त मोर्चा” के बैनर तले ज़िला, तहसील और ब्लॉक मुख्यालयों पर शांतिपूर्ण रैली, प्रदर्शन और सभाएँ आयोजित कीं। इन आंदोलनों का उद्देश्य सरकार का ध्यान आँगनबाड़ी कर्मचारियों की लगातार बिगड़ती आर्थिक स्थिति, वर्षों से लंबित जायज़ माँगों, और कार्यस्थल पर बढ़ती समस्याओं की ओर आकर्षित करना है।

प्रदर्शनकारी कर्मियों ने कहा कि जनहित की महत्वपूर्ण “समेकित बाल विकास योजना (ICDS)” में आँगनबाड़ी कार्यकर्ता रीढ़ की हड्डी हैं। यह योजना इस वर्ष 50 वर्ष पूरे कर रही है, लेकिन इसके जमीनी कार्यकर्ता आज भी स्थायी सरकारी कर्मचारी का दर्जा पाने से वंचित हैं। उन्हें न्यूनतम वेतन, पेंशन, या रिटायरमेंट के बाद कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं दी जाती। सरकार उन्हें “स्वैच्छिक कार्यकर्ता” बताकर केवल नाममात्र का मानदेय देती है, जो बढ़ती महंगाई के बीच भुखमरी जैसी स्थिति पैदा कर रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों के बावजूद उन्हें न तो ग्रेच्युटी दी जा रही है, न ही सरकारी कर्मचारी का दर्जा। विडंबना यह है कि इस योजना में निदेशक से लेकर अन्य अधिकारी सरकारी वेतन पा रहे हैं, लेकिन आँगनबाड़ी कार्यकर्ता गुलामों जैसी स्थिति में काम करने को मजबूर हैं।

विरोध की एक बड़ी वजह यह भी है कि सरकार अब आउटसोर्सिंग के जरिए “एजुकेटर” नियुक्त कर रही है और इस योजना के निजीकरण की शुरुआत कर चुकी है, जिससे आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका सीमित हो रही है। विशेष रूप से 3-6 वर्ष के बच्चों की स्कूल-पूर्व शिक्षा, जो आँगनबाड़ी की मूल सेवाओं में है, उसमें अतिक्रमण किया जा रहा है।
कर्मचारी संगठनों ने यह भी कहा कि जिन्होंने अपने जीवन के 30-40 वर्ष सामाजिक सेवा में लगा दिए — विशेषकर गरीब, वंचित, गर्भवती और धात्री महिलाओं तथा बच्चों के साथ कार्य करते हुए — उन्हें अब पेंशन, फंड या एकमुश्त सहायता के बजाय कटोरा थमाया जा रहा है। कोरोना जैसी महामारी में भी उन्होंने फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में जान जोखिम में डालकर सेवा की, लेकिन अब उन्हें निराशा, अन्याय और उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है।




