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25 साल बाद भी संघर्षरत ‘जिंदा शहीद’ अमित ओबेरॉय, उत्तराखंड आंदोलन की जीवंत मिसाल

भारत न्यूज़ लाइव

देहरादून l 9 नवंबर 2025 को उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। राज्य सरकार इस अवसर को रजत जयंती वर्ष के रूप में मना रही है और यह संदेश दे रही है कि “हम रजत जयंती वर्ष में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल होने जा रहे हैं।” लेकिन जिन लोगों ने इस राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष किया, लाठी-डंडे और गोलियां खाईं, वे आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

राज्य आंदोलन के दौरान कई लोग शहीद हुए, वहीं कुछ ऐसे आंदोलनकारी भी हैं जो घायल होकर आज तक बिस्तर पर पड़े हैं। इन्हें लोग “जिंदा शहीद” कहकर पुकारते हैं। लंबे समय से इन शैयाग्रस्त आंदोलनकारियों के इलाज की मांग राज्य सरकार से की जा रही है, लेकिन आज भी कई लोग सरकारी सहयोग से वंचित हैं।

25 साल बाद भी संघर्षरत ‘जिंदा शहीद’ अमित ओबेरॉय

देहरादून के प्रगति विहार निवासी अमित ओबेरॉय (46) उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान घायल हुए थे। वे पिछले 30 वर्षों से बिस्तर पर हैं और गर्दन से नीचे का शरीर पूरी तरह निष्क्रिय है। 2 अक्टूबर 1995 को वे महज 16 वर्ष के थे और देहरादून के स्कॉलर्स होम स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ते थे।

अमित बताते हैं कि यह घटना 2 अक्टूबर 1995 की है, जब मुजफ्फरनगर की 1994 की बर्बरता की बरसी पर आंदोलनकारियों ने पूरे उत्तराखंड में काला दिवस मनाने का ऐलान किया था। उस दिन देहरादून के रिस्पना पुल पर उग्र प्रदर्शन चल रहा था। शाम तक भीड़ ने पुल को जाम कर दिया था। इसी दौरान एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी का काफिला वहां से गुजरा, जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।

25 साल बाद भी संघर्षरत ‘जिंदा शहीद’ अमित ओबेरॉय

अमित अपने पिता जयकृष्ण ओबेरॉय के साथ वहां मौजूद थे। लाठीचार्ज के दौरान दोनों को चोटें आईं। पिता वहीं गिर पड़े जबकि अमित भागते हुए पुल से नीचे गिर गए। नीचे पत्थरों से भरी सूखी नदी में गिरने के कारण उनकी रीढ़ की हड्डी बुरी तरह चोटिल हो गई।

करीब चार घंटे बाद पुलिस ने उन्हें घायल अवस्था में पाया और कोरोनेशन अस्पताल में भर्ती कराया। वहां से हालत गंभीर होने पर उन्हें चंडीगढ़ रेफर किया गया। परिवार के पास इलाज के पैसे नहीं थे, तो मोहल्ले के लोगों ने मिलकर करीब 35 हजार रुपये इकट्ठे किए, जिनसे उनका इलाज संभव हो सका। यह रकम लौटाने में परिवार को कई साल लग गए।

25 साल बाद भी संघर्षरत ‘जिंदा शहीद’ अमित ओबेरॉय

आज, जब उत्तराखंड अपनी रजत जयंती मना रहा है, अमित ओबेरॉय जैसे ‘जिंदा शहीद’ अब भी संघर्षरत हैं। वे सरकार से यही उम्मीद करते हैं कि राज्य के निर्माण में बलिदान देने वालों को भुलाया न जाए, बल्कि उनके सम्मान और देखभाल के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

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