देहरादूननई टिहरी

उत्तराखण्ड में धूमधाम से मनाई गई इगास वूढ़ी दिवाली l

विक्रम सिंह कठैत ( एडिटर) ,भारत न्यूज़ लाइव

देहरादून / टिहरी l आज पूरे उत्तराखण्ड में पारंपरिक उल्लास, लोक संस्कृति और अपार श्रद्धा के साथ इगास वूढ़ी दिवाली का पर्व मनाया गया। यह पर्व दीपावली के ठीक 11 दिन बाद मनाया जाता है और विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र में इसका अत्यधिक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।

सुबह से ही गांवों में लोग नए वस्त्र धारण कर अपने पूर्वजों की पूजा-अर्चना में जुट गए। घरों में घी के दीपक जलाए गए और पारंपरिक पकवान जैसे पूड़ी, भटवाणी, अरसा, पुआ, सिंगल और झिंगोरा की खीर बनाए गए। हर घर में प्रसन्नता और भक्ति का वातावरण देखने को मिला।

इगास पर्व का आरंभ गाय-बैल और अन्य पशुओं की पूजा से होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अपने मवेशियों को नहलाते हैं, उन्हें तिलक लगाते हैं और घास-भात खिलाते हैं। यह पर्व कृषक और पशुपालक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।

लोग मानते हैं कि भगवान श्रीराम के लंका विजय के बाद जब अयोध्या लौटने का समाचार उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों तक देर से पहुँचा, तब यहां के लोगों ने 11 दिन बाद दीपावली मनाई। इसी कारण इस पर्व को ‘वूढ़ी दिवाली’ या ‘इगास’ कहा जाता है।

दिन भर बच्चों और युवाओं में उत्साह देखने को मिला। शाम को लोगों ने घुगुतिया, बालूशाही, अरसे और मालपुए बनाकर एक-दूसरे को खिलाए। बच्चे “घुगुत घुगुत घुगुती बास, मेरी इगास पाखे हास” कहते हुए घर-घर घूमकर मिठाइयाँ और पैसे इकट्ठे करते हैं। यह परंपरा उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक आत्मा को दर्शाती है।

शहरों में भी इस पर्व का जोश देखने को मिला। देहरादून, पौड़ी, टिहरी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी और नैनीताल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोकगीतों और झोड़ा-चांचरी नृत्यों का आयोजन किया गया।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस अवसर पर प्रदेशवासियों को बधाई दी और कहा कि “इगास हमारी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार पारंपरिक त्योहारों को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करेगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में शाम को ढोल-दमाऊं, भंकोरा और रणसिंघा की धुनों पर लोग पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते रहे। महिलाएँ “भाना-भुला” गीतों से वातावरण को मधुर बना रही थीं। हर ओर लोकधुनों और दीयों की रौशनी से पर्वतीय अंधेरे कोने जगमगा उठे।

कई स्थानों पर पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए दीपदान और हवन भी किए गए। यह पर्व लोगों को अपने पुरखों की स्मृति से जोड़ता है। बुजुर्गों ने बच्चों को इस पर्व की ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि समझाई ताकि नई पीढ़ी अपनी लोक परंपराओं से परिचित हो सके।

स्कूलों और कॉलेजों में भी विशेष कार्यक्रम हुए। बच्चों ने लोकगीत प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक नाटक और दीया सज्जा प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

इगास वूढ़ी दिवाली का यह पर्व केवल आनंद का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी है। उत्तराखण्ड की पहाड़ी घाटियों में इस दिन लोक संस्कृति, परंपरा और आस्था का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला जो आधुनिक युग में भी लोगों को अपनी विरासत की याद दिलाता है।

रात को आकाश आतिशबाजी और दीयों की रोशनी से जगमगाता रहा। पहाड़ी गांवों की वादियों में “जय बद्री विशाल” और “जय श्री राम” के जयकारे गूंजते रहे।

संपूर्ण उत्तराखण्ड ने आज यह संदेश दिया कि पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और लोक संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम हैं।

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